पधारो म्हारे गाँव में…!
गेहूं के खेतों में कंघी जो करे हवाएं, रंग बिरंगी कितनी चुनरिया उड़-उड़ जाए। हुम्म्म्म अह्ह्ह्ह्हा... (रेडियो पर बजता यह गाना) ग्रामीण जीवन अच्छा यह बताइए गांव के बारे में आपके क्या विचार है? यह गाना सुनकर आप का मन नहीं करता क्या और लहराते खेतों को निहारने का ? अच्छा आपने कभी सूरज को प्रातः काल में अपनी लालिमा बिखेरते हुए देखा है? या इंद्रधनुष को खुले आसमान में अपनी रंग बिखेरते हुए? पगडंडियों पर चलते हुए क्या कभी आपका पैर भी फैसला है? और हां गौरैया हां हां वही जो लुप्त सी हो गई है क्या आपने उसे अपने आंगन से दाने और तिनको को बटोरते हुए देखा है? कौवे की कांव-कांव को सुनते ही मेहमान के आने का इंतजार किया है क्या? सरसों के खेत से काले लुटेरो अरे नहीं पहचाने भवरो को रस चुराते हुए क्या आपने भी देखा हैं? क्या आप का मन नहीं करता कुम्हार काका के साथ मिट्टी को रौंदने का... उनके साथ हठखेलिया करने का... गांव…जहां पशुओं की आवाज ही और चरवाहों का हाकना भी मधुर संगीत सा लगता है। पशुपालकों का तालाब में अपनी भैंसों के साथ नहाना और सावन में महिलाओं का झूला झूलना ही सार्थक लगता है। उत्तर से आती ...